केरल से आकर बिहार को दिए 50 साल, मिला पद्मश्री: सुधा वर्गीज ने पटना में जहां 21 साल काम किया, वहीं मिली हत्या की धमकी

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पटना16 मिनट पहलेलेखक: प्रणय प्रियंवद

सुधा वर्गीज चुपचाप काम करती हैं। पिछले लगभग 55 वर्षों से वह केरल से बिहार आकर बिहार काम कर रही हैं। मुहसर बच्चियों के एंपावरमेंट के लिए। उन्हें इसके लिए 2006 में पद्मश्री एवार्ड भी मिला। इस महिला दिवस के अवसर पर जब हम सुधा वर्गीज से मिले तो यह जानकर हैरत हुई कि उनकी हत्या की साजिश पटना में रची गई थी। सुधा वर्गीज को वह इलाका हमेशा के लिए छोड़ना पड़ा था। सुधा वर्गीज के साथ बातचीत में कई बातें सामने आईं।

8वीं क्लास में पढ़ी बिहार की गरीबी और बिहार जाने की जिद ठान ली
भास्कर से बातचीत में सुधा वर्गीज ने बताया कि वे केरल के कोट्टायम में जब आठवीं में पढ़ती थीं, तब कोर्स की किताब में बिहार की गरीबी के बारे में पढ़ा। अपने पिताजी से कहा कि मुझे बिहार जाना है। जब उन्होंने प्लस टू किया तो उसके बाद एक संस्था के जरिए बिहार आ गईं। सबसे पहले वह बिहार में जमालपुर पहुंची और वहां के नोट्रेडम स्कूल में पढ़ाने लगीं। लेकिन जब वहां उन्होंने देखा कि ज्यादातर अफसरों के या संपन्न घरों के बच्चे वहां पढ़ रहे हैं, तो सुधा ने कहा- वे यह करने तो बिहार नहीं आई थीं।

अपना पद्मश्री दिखातीं सुधा वर्गीज।

धीरे-धीरे सुधा वर्गीज पटना आईं और जमसौत नामक मुसहर इलाके में रहना शुरू किया। मुसहरों के बीच काम करने लगी। मुसहर बच्चियों को पढ़ाने लगी। अभी पटना के दानापुर में उनकी संस्था ‘नारी गुंजन’ जिस स्कूल का संचालन कर रही है, उसमें वर्ग तीन से 12 तक की 162 लड़कियां पढ़ रही हैं। गया के सेंटर में वर्ग एक से 8 तक में 100 लड़कियां पढ़ रही हैं।

जिस इलाके में 21 साल रहकर काम किया, वह छोड़ना पड़ा
सुधा अपने 50 साल के समाजसेवा की कहानी जब सुनाती हैं, तो वह कहानी भी उसमें शामिल होती है जब वह पटना के पास जमसौत गांव में रह रही थी। वह मुसहरों की बस्ती है। वहां यादव और मुसहर जाति के युवाओं के बीच झगड़ा हो गया। दो मुसहर लड़कों ने यादव लड़कों पर मुकदमा कर दिया। सभी ने यही निष्कर्ष निकाला कि सुधा वर्गीज के उकसाने पर ही मुकदमा किया गया है।

वर्गीज आगे बताती हुए सिहर सी जाती हैं। कहती हैं कि रात के 11 बजे एक व्यक्ति खिड़कियों से उन्हें देख रहा था और वह काफी डर गईं थी। जल्दी से सभी को बुलाया और तब तक वह व्यक्ति भाग गया। तब एक मीटिंग भी आनंद बाजार हुई थी, जिसमें यह तय किया गया कि सुधा वर्गीज को साफ कर देना है। यानी हत्या कर देनी है। इस मीटिंग में मौजूद एक व्यक्ति ने ही आकर सुधा को यह जानकारी दी।

फिर जमसौत के कई मुसहर परिवार सुधा वर्गीज के पास आए और कहा कि आप यह इलाका छोड़ दीजिए। सुधा कहती हैं कि जिस जगह उन्होंने जीवन के 21 साल बिताए, लोगों के लिए दिन-रात का किया, वह इलाका उन्हें छोड़ना पड़ा। यह घटना साल 2005 की है।

10 महिलाओं से शुरू की संस्था, अब 1000 महिलाएं खेती कर घर चला रहीं
सुधा स्वीकार करती हैं कि अगर वह इलाका इन्होंने नहीं छोड़ा होता तो बहुत संभव है, उनकी हत्या हो जाती और वे अभी 72 साल की उम्र नहीं जी रही होतीं। गांव तो उन्होंने छोड़ दिया लेकिन सुधा के अंदर की जिद कायम रही। वह मुसहर बच्चियों को आगे बढ़ाने के लिए काम करती रहीं। सुधा ने महिलाओं को आर्थिक नजरिए से स्वावलंबी बनाने के लिए 10 महिलाओं को खेती के लिए मोटिवेट किया। पट्टा पर जमीन दिलवाई। अब एक हजार महिलाएं खेती कर रही हैं और अपना परिवार चला रही हैं।

अपने ऑफिस में कास करती सुधा वर्गीज।

अपने ऑफिस में कास करती सुधा वर्गीज।

रात 11 बजे सोती हैं और सुबह 5 बजे उठ कर लग जाती हैं स्कूल में, शादी भी नहीं की
72 साल की सुधा वर्गीज हर दिन रात 11-12 बजे सोती हैं और सुबह 5 बजे उठ जाती हैं। नारी गुंजन में वर्ग 3 से वर्ग 12 तक जो लड़कियां रहकर पढ़ती हैं, उनके बारे में जानकारी लेती हैं। सभी के लिए चार समय का खाना यहां बनता है और समय से पढ़ाई के अलावा, कराटे और संगीत की भी शिक्षा दी जाती है। उन्होंने आज तक शादी नहीं की। शादी क्यों नहीं की? इस सवाल के जवाब में वह कहती हैं कि शादी कर लेती तो फिर ये सब काम बच्चियों के लिए मैं नहीं कर पाती। दो लोगों ने एप्रोच भी किया पर मैंने ना कर दी।

सिर्फ सिद्धांत से शराबबंदी सफल नहीं होगी, मुसहरों को वैकल्पिक कार्य देना होगा
शासन-प्रशासन-सरकार के सिस्टम से आपके अंदर टीस होती है क्या? इस सवाल के जवाब में वे कहती हैं कि ‘जरूर होती है। सरकारी स्कूल का सिस्टम देख लीजिए। हमारे बगल में एक स्कूल है। शिक्षा के सरकारी सिस्टम में बहुत ज्यादा बदलाव की जरूरत है।’

मुसहर समाज शराब के कारोबार में जुड़ा रहा। इसलिए सुधा वर्गीज के लिए यह सवाल भी बनता है कि बिहार में जो शराबबंदी है वह सही है ना? जवाब में वह कहती हैं कि मैं तो वर्षों से मुसहरी में रहकर, वहां जा-जाकर लोगों को कहती रही हूं कि शराब बुरी चीज है। लेकिन सरकार ने शराब तो बंद करा दिया पर मुसहर परिवार के लिए अल्टर्नेटिव की व्यवस्था नहीं की। सिर्फ सिद्धांत से यह बंदी सफल नहीं होगी।

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