कोरोना काल में टल गए 30 हजार ऑपरेशन: एसिम्प्टोमैटिक मरीजों की बढ़ती संख्या ने सर्जरी का इंतजार किया लंबा; पटना में रोजाना होते थे 900 से अधिक ऑपरेशन

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पटना8 मिनट पहले

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प्रतीकात्मक तस्वीर।

कोरोना काल में पटना में 30 हजार ऑपरेशन टल गए हैं। एसिम्प्टोमैटिक मरीजों की बढ़ती संख्या के कारण संक्रमण डर बड़ी बाधा बना है। इमरजेंसी में डॉक्टरों ने तो जोखिम उठाया है, लेकिन टालने वाले ऑपरेशन को हाथ नहीं लगाया है। प्राइवेट के साथ सरकारी हॉस्पिटल में भी ऐसा ही हुआ है। किडनी और गुर्दे की पथरी के साथ हड्‌डी व अन्य सामान्य रोगाें के ऑपरेशन को टाल दिया गया है। IMA बिहार के सेक्रेटरी सुनील कुमार का कहना है पटना में सामान्य दिनों में एक दिन में 900 से अधिक ऑपरेशन होते हैं।

ऑपरेशन के दौरान संक्रमण का खतरा

कोरोना की दूसरी लहर में सबसे अधिक खतरा एसिम्प्टोमैटिक मरीजों से था। इस बार ऐसे मरीज अधिक आए हैं जो एंटीजन और RT PCR में पकड़ में नहीं आए हैं। HRCT में ही ऐसे मरीजों की पहचान हो पाई है। पहली लहर में ऐसे मामले नहीं थी। लक्षण नहीं होने के बाद भी संक्रमित होने पर RT PCR में जांच हो जाती थी। इस बार जांच में समस्या आई तो डॉक्टरों ने ऐसे ऑपरेशन को टाल दिया जो टलने लायक था। कई प्राइवेट अस्पतालों ने तो ऑपरेशन पूरी तरह से बंद कर दिया था।

कोविड का डेडिकेटेड हॉस्पिटल बनने से ऑपरेशन ठप

पटना में कई बड़े हॉस्पिटल को कोरोना का डेडिकेटेड हॉस्पिटल बना दिया गया है। इसमें नालंदा मेडिकल कॉलेज और इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान शामिल है। इन दोनों हॉस्पिटल को कोरोना का डेडिकेटेड हॉस्पिटल बनाया गया, जिसके बाद यहां सामान्य मरीजों का इलाज बंद हो गया। दोनों बड़े हॉस्पिटल में ऑपरेशन सभी विभागों में होता है लेकिन कोरोना का इलाज होने के कारण ऑपरेशन बंद कर दिया गया है।

पटना के 5 हजार हॉस्पिटल में होता है ऑपरेशन

पटना में 5 हजार से अधिक छोटे बड़े हॉस्पिटल हैं। इसमें सरकारी भी शामिल हैं। पटना मेडिकल कॉलेज, नालंदा मेडिकल कॉलेज, पटना एम्स, इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान, के साथ सदर अस्पताल में ऑपरेशन 10 प्रतिशत भी नहीं हो पाए। सरकारी अस्पतालों को मिलाकर ही 300 से अधिक ऑपरेशन एक दिन में हो जाते हैं जो काफी कम हो गए। गर्दनीबाग के राकेश झा का कहना है कि उन्हें पेट की पथरी का ऑपरेशन कराना था वह इसके लिए ऑफिस से पहले छुट्‌टी भी ले लिए लेकिन कोरोना के कारण सर्जरी नहीं हो पाई। केसरी नगर की सुमन सिंह का कहना है कि उनकी बहन के बाएं हाथ में ग्लैंड है डॉक्टर ने ऑपरेशन की सलाह दी पर समय आने पर टाल दिया। ऐसे और कई ऑपरेशन को टाला गया है।

प्रसव की सर्जरी के लिए भी भटकना पड़ा

प्रसव की सर्जरी के लिए भी लोगों को काफी भटकना पड़ा। राजीव नगर के सामाजिक कार्यकर्ता विवेक विश्वास का कहना है कि कोरोना का ऐसा डर था कि जहां पहले से इलाज चल रहा था वहां भी डॉक्टर ऑपरेशन करने को तैयार नहीं हुए। काफी सावधानी के साथ किसी हॉस्पिटल में ऑपरेशन हुआ भी तो इसके लिए पैसा काफी अधिक लिया गया। सरकारी हॉस्पिटल में भी प्रसव के ऑपरेशन के लिए प्रसूताओं को काफी भटकना पड़ा। हालांकि सरकारी हॉस्पिटल में ऐसी महिलाओं को थोड़ी राहत मिली है। प्रसव के दौरान महिलाओं की सोनोग्राफी भी मुश्किल से हो पाती है।

ऑक्सीजन के कारण भी आई बड़ी बाधा

ऑक्सीजन के कारण भी बाधा आई है। IMA के सेक्रेटरी डॉक्टर सुनील कुमार का कहना है कि कोरोना काल में ऑक्सीजन को लेकर समस्या हो गई। इस कारण से भी ऑपरेशन टल गए। छोटे हॉस्पिटल में तो ऑक्सीजन ही नहीं मिल पाया इस कारण से समस्या आ गई। IMA का कहना है कि इस बीच लगातार ऑक्सीजन की डिमांड की जाती रही लेकिन प्रशासन व्यवस्था नहीं कर पाया इससे प्राइवेट अस्पतालों में असर पड़ा है।

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