भाजपा विधायकों के निलंबन पर हाईकोर्ट का नोटिस

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उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति शमीम अख्तर ने बुधवार को तेलंगाना विधानमंडल सचिव को तीन भाजपा विधायकों द्वारा दायर एक रिट याचिका में नोटिस जारी किया, जिसमें चल रहे विधानसभा बजट सत्र से उनके निलंबन को चुनौती दी गई थी।

न्यायाधीश ने सचिव को गुरुवार (आज) तक तीन विधायकों के निलंबन के कारणों की व्याख्या करने का निर्देश दिया। इस मामले पर आज फिर सुनवाई होगी। भाजपा विधायक एम. रघुनंदन राव, ई. राजेंद्र और टी. राजा सिंह ने यह याचिका दायर की थी, जिन्हें बजट पेश करने के दिन तेलंगाना विधानसभा बजट सत्र की पूरी अवधि के लिए निलंबित कर दिया गया था।

हालांकि न्यायाधीश ने सचिव को नोटिस जारी किया, लेकिन याचिकाकर्ताओं द्वारा मांगे गए विधायकों के निलंबन के प्रस्ताव की एक प्रति प्रस्तुत करने के लिए कोई विशेष निर्देश नहीं दिया गया। निलंबित विधायकों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील देसाई प्रकाश रेड्डी ने कहा कि सचिव को निलंबन के प्रस्ताव की प्रति देनी चाहिए।

जब न्यायाधीश ने यह जानना चाहा कि याचिकाकर्ताओं ने प्रस्ताव की प्रति के बिना अदालत का रुख कैसे किया, तो श्री प्रकाश रेड्डी ने कहा कि विधानसभा से विधायकों के निलंबन की व्याख्या करने वाले अखबार की कतरनें अदालत में पेश की गईं। उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि कुछ क्षेत्रीय टीवी समाचार चैनलों ने बजट प्रस्तुति की कार्यवाही का प्रसारण किया था। यह कहते हुए कि एक समाचार चैनल द्वारा प्रसारित एक वीडियो फुटेज भी प्रस्तुत किया गया था, वरिष्ठ वकील ने न्यायाधीश से इसकी जांच करने का अनुरोध किया।

उन्होंने तर्क दिया कि वीडियो फुटेज से पुष्टि होगी कि तीनों विधायकों को बिना किसी वैध कारण के निलंबित कर दिया गया था। उन्होंने दलील दी कि बजट पेश करने के दिन सत्र के 15 से 20 मिनट के भीतर विधायकों को निलंबित कर दिया गया। यह नियमों का पूरी तरह से उल्लंघन था, उन्होंने अदालत को बताया।

विधान में विधान सभा के निलंबित सदस्य को बहाल करने का प्रावधान है यदि उसी दल का कोई अन्य सदस्य ऐसा प्रस्ताव रखता है। लेकिन इस मामले में भाजपा के तीनों विधायकों को निलंबित कर दिया गया। निलंबन का प्रस्ताव पेश करने से पहले स्पीकर के लिए एक विधायक का नाम लेना अनिवार्य था।

लेकिन पशुपालन मंत्री ने निलंबन का प्रस्ताव पेश किया जो नियमों का घोर उल्लंघन है, वकील ने कहा। महाधिवक्ता बीएस प्रसाद ने कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत वीडियो फुटेज की प्रामाणिकता को सत्यापित करने की आवश्यकता है, अदालतें विधानसभा की कार्यवाही में हस्तक्षेप नहीं कर सकती हैं।

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