सिस्टम की इच्छाशक्ति से जिंदा हुआ मृत ICU: वीडियो कॉल पर दिल्ली एम्स से वेंटिलेटर शुरू करने की तकनीक सीख बचा ली कई जान, सूबे के साथ देशभर में लागू होगा यह मॉडल

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औरंगाबाद6 मिनट पहलेलेखक: ओम प्रकाश सिंह

वेंटिलेटर शुरू कराने के मुद्दे पर स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय डॉक्टरों की कमी को सबसे बड़ी वजह बताकर हाथ खड़े कर चुके हैं। इसी बीच औरंगाबाद ने देश के सामने एक मिसाल पेश की है। औरंगाबाद सदर अस्पताल में कम संसाधन, एक डॉक्टर और कुछ नर्स की बदौलत वीडियो कॉल पर दिल्ली एम्स से तकनीक सीख चार साल से बंद पड़े और कबाड़ बन चुके ICU के चार वेंटिलेटर को इसी सिस्टम ने शुरू कर दिया, जिसकी लगातार आलोचना हो रही है। इससे अब तक कई मरीजों की जान भी बचाई जा चुकी है। अब इस मॉडल को राज्य सरकार ने भी बेहतर बताया है और औरंगाबाद DM से इससे जुड़ी हर जानकारी दो दिनों के अंदर मांगी है।

वेंटिलेटर पर भर्ती होने वाले 7 मरीज सुरक्षित बचाए गए

DM सौरभ जोरवाल ने दैनिक भास्कर को बताया कि ICU को किन हालत में और कैसे शुरू किया गया, इसके लिए कौन-कौन से उपाय किए गए? इस संबंध में हर एक जानकारी सरकार ने मांगी है। इसे तैयार कर भेजा जा रहा है। ICU के वेंटिलेटर पर भर्ती होने वाले सात मरीज सुरक्षित तरीके से बचा लिए गए हैं, जो स्वस्थ होकर लौट चुके हैं। इनमें से कई मरीजों का ऑक्सीजन लेवल काफी कम था।

उन्होंने कहा कि इस मुहिम में डीडीसी के साथ प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग ने सहयोग किया। डॉ. जन्मेजय ने वीडियो कॉलिंग से तकनीक सीखी और खूब मेहनत की। ICU की पूरी टीम ने शानदार काम किया, जिसके चलते यह कामयाबी मिली। मैं हर पल अपडेट लेता हूं। खुद दर्जनों बार वहां जा चुका हूं।

जानिए, कबाड़ वेंटिलेटर के शुरू होने की पूरी कहानी

पावर ग्रीड कंपनी के सहयोग से सदर अस्पताल में करीब चार साल पहले पौने तीन करोड़ की लागत से ICU का निर्माण हुआ था। बाद में इसके चार वेंटिलेटर कबाड़ बन गए। अधिकांश सामान खराब हो गए थे। तारों को चुहों ने कूतर दिया। 2 साल पहले हीट स्ट्रोक से 70 लोगों की जानें गई थी। तब स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने अपने दौरे में ICU शुरू कराने की बात कही थी, लेकिन डॉक्टरों व टेक्नीशियन की कमी के कारण यह हो न सका।

इधर कोरोना की दूसरी लहर का पीक जिले में 20 अप्रैल से पांच मई तक रहा। इस दौरान सिस्टम के भी कई लोगों की जानें गई। हर रोज कोविड सेंटर से लाशें निकल रही थी। फिर जान बचाने के हर एक बिंदु पर विचार किया गया। तत्काल बंद पड़े ICU का वेंटिलेटर शुरू कराने का विचार आया। इसके बाद SP सुधीर कुमार पोरिका, DDC अंशुल कुमार, सिविल सर्जन डॉ. मो. अकरम अली, DPM व कुछ अन्य अधिकारियों के साथ आपात बैठक हुई।

इसमें सदर अस्पताल के डॉ. जन्मेजय का नाम सामने आया। तुरंत उन्हें तलब किया गया। अचानक बताया गया कि आपको ICU का इंचार्ज बनाया जाता है। डॉक्टर नौकरी छोड़ने वाले थे, लेकिन DM ने उनसे आग्रह किया। कहा कि मैंने IAS बनने से पहले इंजीनियरिंग की थी। मेडिकल किया होता तो आज आपका साथ देता और मरीजों का इलाज करता। यह सुनकर डॉक्टर ने हामी भर दी।

फिर इसके बाद सिविल सर्जन, DPM को सहयोग करने की जिम्मेवारी दी गई। DDC को स्पेशल देखरेख के लिए नियुक्त किया गया। इस संबंध में 20 मीटिंग हुई। फिर DM ने WHO व दिल्ली एम्स के डॉक्टरों से संपर्क किया। वीडियो कॉल और वर्चुअल तरीके से ICU इंचार्ज डॉक्टर और नर्स को ट्रेनिंग दिलाई। ट्रेनिंग के बाद पांच मॉकड्रिल हुआ। इसके बाद 10 मई से ICU शुरू की गई। इसमें भर्ती होने वाले सात मरीजों की जान अबतक सफलतापूर्वक बचा ली गई है। अभी भी चार कोविड मरीजों को भर्ती किया गया है, जिनकी हालत खतरे से बाहर है।

दिल्ली तक के अधिकारियों ने मीटिंग कर मॉडल समझा

इस मॉडल को समझने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य विभाग के नेशनल कोऑर्डिनेटर अजीत सिंह, दिल्ली एम्स और एशिया लेवल के ट्रॉमा एक्सपर्ट डॉ. संजीव कुमार घई, दिल्ली एम्स में कोविड को लीड कर रहे डॉ. तेज प्रकाश ने तीन दिन पहले औरंगाबाद DM, डीडीसी, सिविल सर्जन, ICU इंचार्ज समेत करीब 30 डॉक्टरों की वर्चुअल मीटिंग की है।

अधिकारियों ने पूरे मॉडल को समझा है। चार साल से बंद ICU कैसे शुरू कराया गया, वीडियो कॉलिंग से यह कैसे संभव हुआ, किन-किन जरूरतों को कहां से पूरा किया गया, किन-किन बातों का ध्यान रखा गया और इसमें DM, प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग का बेहतर तालमेल कैसे हुआ? जिसके कारण असंभव, संभव हुआ। इन तमाम बातों की जानकारी नेशनल कोऑर्डिनेटर व ट्रॉमा एक्सपर्ट ने ली है और इस मॉडल को बिहार के साथ देश के अन्य जिलों में लागू कराने की बात कही है।

यह तकनीक वहां लागू होगी, जहां वेंटिलेंटर तो हैं, लेकिन डॉक्टर और टेक्निशियन नहीं हैं। अगर हैं तो काफी कम हैं। ऐसे में राज्य व केंद्र सरकार इस मॉडल को लागू कराकर खराब पड़े वेंटिलेटर को शुरू कराएगी, जिससे मरीजों की जान बचाई जा सके।

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