RJD का आरोप- सत्ताधारी दल के समर्थक बने शराब माफिया: राजद के मुख-पत्र ने शराबबंदी की समीक्षा के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की

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पटना28 मिनट पहले

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तेजस्वी यादव (बाएं) और CM नीतीश कुमार (दाएं)

बिहार में शराबबंदी पर सवाल उठ रहे हैं। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव लगातार इस मामले को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से सवाल करते आ रहे हैं। अब RJD नेता प्रेमकुमार मणि के संपादन में निकलने वाले राजद के मुखपत्र ‘राजद समाचार’ में मणि ने शराबबंदी पर संपादकीय लिखा है। उन्होंने मांग की है कि सर्वदलीय बैठक कर शराबबंदी की तत्काल समीक्षा करें नीतीश कुमार। उन्होंने कहा है कि वीणा के तार को इतना मत कसो की वह टूट जाए, नीतीश कुमार कि जिद ने यही किया है।

1977 में कर्पूरी ठाकुर की सरकार ने भी पूर्ण शराब बंदी की थी
मणि ने लिखा है कि- बिहार में पहली बार शराबबंदी नहीं हुई है।1977 में जब जननायक कर्पूरी ठाकुर की सरकार थी, बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू की गई थी। वह कारगर ढंग से काम भी कर रही थी। 1980 में जब जगन्नाथ मिश्र की कांग्रेसी सरकार बनी तब शराबबंदी उठा ली गई।1990 में जब लालू प्रसाद के नेतृत्व में जनता दल की सरकार बनी तो मद्य निषेध विभाग को इस रुप में सक्रिय किया गया कि यह धंधा हर स्तर पर हतोत्साहित हुआ।

बेतुकी और गंदी सोच थी
2005 के आखिर में जब नीतीश सरकार आई तब शराब के धंधे को गांव-कस्बों तक इस तर्क के साथ फैला दिया गया कि इससे राजस्व की वृद्धि होगी और विकास कार्य संपादित किए जाएंगे। यह बेतुकी और गंदी सोच थी। इसके बाद लगभग 10 वर्षों तक भाजपा-जदयू की सरकार ने गांव-गांव शराब के धंधे का विस्तार कर दिया। नतीजा यह हुआ कि महिलाओं ने मोर्चा संभाला और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सभाओं में जगह-जगह उग्र प्रदर्शन होने लगे। 2015 में राजद-जदयू की सरकार बनी जिसमें नीतीश कुमार मुख्यमंत्री थे तब पूर्ण शराबबंदी का फैसला लिया गया। लेकिन इसे लागू करने की तरीकों पर राजद की पृथक सोच थी।

जिन महिलाओं ने शराबबंदी की मांग की थी वही जार-बेजार रो रहीं
मणि ने लिखा है कि आज वही महिलाएं जार-बेजार रो रही हैं, जिन्होंने शराबबंदी की मांग की थी और नीतीश के खिलाफ प्रदर्शन किए थे। उन्होंने कहा है कि सरकारी स्तर पर तो इसे जरूर रोक दिया गया पर जमीनी हकीकत यह है कि शराब की होम डिलेवरी शुरू हो गई। सत्ता से जुड़े लोग इसके एजेंट बन गए या तमाम एजेंट सत्ता पक्ष से किसी न किसी रुप में जुड़ गए। सरकार इसलिए चुप रही कि सभी शराब माफिया सत्ताधारी दल के समर्थक बन गए। मणि ने सर्वदलीय बैठक कर शराबबंदी की समीक्षा की मांग की है।

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