Stationery Inflation: कॉपी-किताबों का बढ़ा बोझ, 50 फीसदी तक हुआ कीमतों में इजाफा

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Stationary Price increased: देशभर में लगातार बढ़ रही महंगाई का असर अब बच्चों की कॉपी-किताबों और शिक्षा पर भी पड़ने लगा है. पेट्रोल-डीजल और कच्चे माल की रेट बढ़ने के बाद अब कॉपी-किताबों के दाम 35 से 50 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं. इसके अलावा दो साल बाद मांग काफी ज्यादा आने से बाजार में किताबें की कमी भी बनी हुई है.

50 फीसदी तक बढ़ी कीमतें

बता दें कि अप्रैल से नया शैक्षिक सत्र शुरू हो गया है. सरकार ने निजी स्कूलों की फीस वृद्धि पर लगी रोक को हटा लिया है. वहीं दूसरी तरफ अब किताबों और ड्रेस, जूता आदि के कीमत में 50 प्रतिशत तक की वृद्धि हो गयी है. ऐसे में अभिभावकों की दिक्कत काफी बढ़ती दिख रही है. इसके अलावा स्कूली बैग की कीमत में सौ से डेढ़ सौ रुपये का इजाफा हुआ है. फुटवियर पर जीएसटी दर पांच से 12 फीसदी होने के बाद स्कूल शूज की कीमतों में 150 रुपये तक का इजाफा हुआ है.

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कच्चा माल हुआ महंगा

कारोबारियों के अनुसार कॉपी-किताब तैयार करने के लिए जरूरी कच्चे माल के दाम कोरोना काल में ज्यादा बढ़ गए हैं. प्लास्टिक के दाने की कीमत 80 रुपये से 160-170 रुपये किलो हो गई है. वहीं, कागज का रेट 50 से बढ़कर 85 रुपये प्रति किलो हो गया है. कारोबारियों के अनुसार कॉपी-किताबों का जो सेट पहले औसतन तीन हजार रुपये में आता था, वह इस बार पांच हजार रुपये में बिक रहा है. इसी तरह निजी प्रकाशकों की गणित, विज्ञान, अंग्रेजी की जो किताब 300 से 325 रुपये तक की आती थी वो अब 400 रुपये तक हो गई है.

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दो साल के बाद कॉपी-किताबों की बढ़ी डिमांड

बता दें कि कोरोना महामारी के चलते साल 2020 में लॉकडाउन लगने से स्कूल बंद हो गए थे. 2021 में भी समय से स्कूल नहीं खुल पाए, जिसका असर पुस्तक व स्टेशनरी कारोबार पर पड़ा. देर से स्कूल खुलने पर अपेक्षाकृत कारोबार नहीं हो सका. कम संख्या में ही बच्चों द्वारा पुस्तक व स्टेशनरी की खरीदारी की, जिससे पुस्तकों और स्टेशनरी का स्टॉक बच गया. लेकिन साल 2022 में शासन ने कोरोना की सभी पाबंदियां हटा दी गई है. इसके बाद कॉपी-किताबों की डिमांड काफी बढ़ गई और इनकी महंगी कीमतों ने अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी.

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